Betul Samachar : यूसीसी के विरोध में आदिवासी एकता परिषद ने रैली निकालकर सौंपा ज्ञापन, आदिवासियों की संस्कृति पहचान को समाप्त करने वाले कानून को वापस लेने की मांग
Betul Samachar: In protest against UCC, Adivasi Ekta Parishad took out a rally and handed over a memorandum, demanding withdrawal of the law ending the cultural identity of tribals.
Betul Samachar : (बैतूल)। राष्ट्रीय आदिवासी एकता परिषद के बैनर तले गुरुवार 27 जुलाई को भारत मुक्ति मोर्चा, बहुजन क्रांति मोर्चा, राष्ट्रीय मूलनिवासी महिला संगठन, राष्ट्रीय पिछड़ा वर्ग मोर्चा, बहुजन मुक्ति पार्टी ने एकजुट होकर समान नागरिक संहिता यूसीसी के विरोध में जिला मुख्यालय पर धरना प्रदर्शन कर रैली निकाली। इसके बाद राष्ट्रपति के नाम जिला प्रशासन को ज्ञापन सौंपकर आदिवासियों की संस्कृति पहचान को समाप्त करने वाले काले कानून यूसीसी को वापस लेने की मांग की। संगठनों ने इस प्रदर्शन के माध्यम से यूसीसी लागू हो जाने से आदिवासियों के सामने आने वाली परेशानियों पर चिंता व्यक्त की।
संगठन की पुष्पा मर्सकोले, बीआर भूमरकर, दुर्गासिंह मर्सकोले, बीएल मासोदकर, सुंदरलाल उइके ने कहा कि अगर केंद्र सरकार यूसीसी लागू करती है तो यह आदिवासियों के विशेष अधिकारों का हनन होगा। आदिवासियों को संविधान में विशेष अधिकार मिला है। हिंदू मैरिज एक्ट के तहत आदिवासियों की शादी नहीं होती है। संबंध विच्छेद में भी अलग तरीका अपनाया जाता है।
हमारे यहां सामाजिक तौर पर इनका निपटारा होता है। अगर यूसीसी पूरे देश में लागू हो जाएगा तो आदिवासियों का न केवल विशेषाधिकार खत्म होगा बल्कि हमारा अस्तित्व भी खतरे में आ जाएगा वहीं, जल जंगल जमीन और परंपरा आदिवासियों की विरासत है। यूसीसी लागू कर केंद्र सरकार आदिवासियों का हक नहीं छीन सकती। यह हमारे लिए अधिकार की लड़ाई है। हम किसी भी कीमत में इस लड़ाई से पीछे नहीं हटेंगे। आपको बता दें कि भारत सरकार द्वारा समान नागरिक संहिता लागू करने के लिए भारतीय विधि आयोग द्वारा सुझाव और विचार मांगा जा रहा है। ऐसे में आदिवासी एकता परिषद, भारत मुक्ति मोर्चा एवं बहुजन क्रांति मोर्चा का कहना है कि यूसीसी आदिवासी समुदाय को दिए गए विशेषाधिकार का हनन है।
महामहिम राष्ट्रपति के नाम सौंपे ज्ञापन में उल्लेख किया गया कि विडंबना यह है कि जिन तमाम विदेशी आक्रमणकारियों से लड़ते हुए गुलाम भारत में आदिवासी महापुरुषों ने जंगल, जल, जमीन और अपनी संस्कृति को सुरक्षित करने के लिए जान की बाजी लगाई थी, लेकिन तथाकथित 1947 को मिली आजादी और हमें 1950 में मिले अधिकारों के बावजूद विकास के नाम पर, पर्यावरण संरक्षण के नाम एवं वन्य प्राणियों के संरक्षण के नाम पर आदिवासियों की उनके जल, जंगल और जमीन से विस्थापित किया गया और उनका पुनर्वास करने का कोई ईमानदार प्रयास नहीं हुआ। जबकि संविधान में अनुच्छेद 244 के तहत अनुसूची 5 और 6 में उल्लेख है कि इन क्षेत्रों में केंद्रिय या राज्य सरकार को दखल देने का कोई अधिकार नहीं होगा। बल्कि जनजाति मंत्रणापरिषद की स्थापना कर वही विकास की सारी संभावनाओं को जमीन पर उतारने का काम करें और उसका नियंत्रण प्रदेश में राज्यपाल और देश में राष्ट्रपति के अधीन होगा। लेकिन संवैधानिक व्यवस्था के विरोध में राज्य और केंद्र की सरकारे लगातार आदिवासियों के विरोध में कानून बनाकर आदिवासियों को बेदखल करने का काम कर रही है। इसलिए देशभर के लाखों जनजातियों के सामाजिक संगठनों में आक्रोश होने से उन्हें आंदोलन करना पड़ रहा है और हम संगठनों ने अपनी बुनियादी और जायज मांगों को एकत्रित कर सरकार का ध्यान आकर्षित करने के लिए यह कदम उठाया है।
सतत जारी रहेगा उलगुलान
संगठनों ने चेतावनी दी है कि हम मूलनिवासियों की विरासत को जिन्होंने भी तहस नहस करने की कोशिश की तो हम उन्हें किसी भी हालत में छोड़ने वाले नही है। हमारा उलगुलान सतत जारी रहेगा। प्रदर्शन में ज्ञापन सौंपने वालों में शोभा पाटिल, एसजी जावरकर, मोहन उईके, बरातीलाल सेलूकर, अनिल उईके, अंगद चौधरी, अनिल सरियाम हरि इवने, शरद कावरे, लखनलाल उईके, रितेश कवड़े, अरविंद कुमरे, पंकज, रूपेश, दिलीप लोखंडे, रेवाराम सलामे, रवि भलावी सहित इन संगठनों के पदाधिकारी एवं कार्यकर्ता शामिल थे।



