Betul News : बैतूल के प्राइवेट स्कूल उड़ा रहे हैं शिक्षा विभाग के नियमों की धज्जी
Betul News : Betul's private schools are flouting the rules of education department
– शिक्षा का अधिकार अधिनियम का लाभ लेने घिसनी पड़ती है चप्पलें
– बैतूल के प्राइवेट स्कूल उड़ा रहे हैं शिक्षा विभाग के नियमों की धज्जी
– बैतूल शहर के कई स्कूलों में नहीं है खेल मैदान नहीं होने से चक दे बैतूल से दूर बच्चे
Betul News : नि:शुल्क और अनिवार्य बाल शिक्षा का अधिकार अधिनियम में यदि आपको बैतूल के किसी निजी स्कूल में अपने बच्चे को दाखिला दिलवाना है तो पहले ऊपर तक पहुंच या सिफारिश लाईये, ये दो चीज आपके पास नहीं है तो फिर शिक्षा का अधिकार अधिनियम का लाभ लेने की सोचना भी बेकार है। जी, हां दरअसल बैतूल शहर के निजी स्कूलों में यथार्थ योद्धा की टीम ने एक सर्वे किया जिसमें पाया कि अधिकत निजी स्कूल आरटीई के तहत स्कूल में एडमिशन लेने वालों को खासा परेशान करते हैं, पहले तो नियमों का हवाला देते हैं इसके बाद कोई ना कोई बहाना बनाकर दर्जनों बार आपसे स्कूल के चक्कर लगवा लेंगे और बाद में नतीजा निकलना तो दूर आप शिक्षा का अधिकार पाने के झंझट से ही मुक्ति पाने की सोचने लगेंगे। इसके अलावा लगभग आधा सैकड़ा निजी स्कूलों में शिक्षा विभाग के मापदंडों की जमकर धज्जियां उड़ाई जा रही है, ना तो स्कूल भवन ढंग के बने हैं और ना ही कई स्कूलों के पास खेल मैदान की व्यवस्था है। खेल मैदान नहीं होने से बच्चे स्पोर्ट्स जैसे सब्जेक्ट से दूर होते जा रहे हैं। बच्चे खेलना तो चाहते हैं लेकिन स्कूल में एनसीसी, स्पोट्र्स की व्यवस्थाएं नहीं होने के कारण बच्चे पिछड़ रहे हैं, वहीं बच्चों को स्कूल लाने ले जाने वाले अनफिट वाहन भी सडक़ों पर दौड़ रहे हैं।
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– संचालकों की मनमानी पर रोक जरूरी
समाजसेवी प्रदीप चौकीकर ने कहा कि प्राइवेट स्कूल के संचालकों की मनमानी पर रोक लगना चाहिए। प्राइवेट स्कूलों में नामांकन हेतु मनमानी राशि की मांग की जाती है। बगैर निबंधन चल रहे प्राइवेट स्कूलों में शिक्षा का अधिकार कानून का पालन करवाने के लिए शिक्षा विभाग द्वारा पहल कीा जाना चाहिए। वहीं शहर के प्रबुद्ध नागरिक दीपक चौरसिया ने बताया कि आॢथक रुप से कमजोर बच्चों को इस कानून का लाभ दिलाया जाना चाहिए । इस कानून के तहत अभिभावकों द्वारा लाभ मांगें जाने पर स्कूल प्रबंधक कतराने लगते हैं। गरीब बच्चों को आरटीई का लाभ नहीं मिल रहा है।
– शिक्षा के नाम पर व्यापार कर रहे है अधिकतर स्कूल
स्कूलों की मान्यता लेने के लिए सरकार द्वारा कमेटियों को रजिस्टर किया जाता है, उसमें कमेटियों द्वारा कहा जाता है कि वह बिना स्वार्थ के शिक्षा का प्रसार करेंगे, परंतु अब हालात ऐसे पैदा हो गए है कि शिक्षा एक व्यापार बन गया है व व्यापार स्कूल कर रहे है, जबकि शिक्षा का प्रसार कम कर रहे है। कई स्कूलों की शिकायतें विभाग के पास जाती है, परंतु वह गोल हो जाती है। अधिकारियों की लापरवाही के कारण शिक्षा का व्यापारीकरण हो रहा है तथा अभिभावकों का खून चूसा जा रहा है।
– स्कूल बोले हमारी है अधिकारियों से सीधी बात
जिले के अधिकतर स्कूल तो ऐसे हैं, जो बोलते हैं कि शिक्षा विभाग के अधिकारियों से सीधी बातचीत है, हम किसी से भी नहीं डरते। यह स्कूल आई.ए.एस. व आई.पी.एस. अधिकारी भी संपर्क में है, वह जब भी स्कूल में कोई फंक्शन होता है तो अधिकारियों को ही निमंत्रण देते हैं ताकि अभिभावकों पर दबाव बना रहे।
नियमों में उलझा देता है स्कूल मैनेजमेंट
प्राइवेट स्कूल में शिक्षा का अधिकार कानून (आरटीई) की धज्जियां उड़ती नजर आ रही है। जिलें में संचालित अनेक प्राइवेट स्कूल विभागीय कसौटी पर खरा नहीं उतर रहे है। खेल मैदान, समुचित भवन व शौचालय जैसी बुनियादी सुविधाओं का अभाव अधिकांश स्कूलों में देखा जाता है। बच्चों के परिजनों को स्कूल द्वारा निर्धारित महंगे पुस्तकों के अलावा अन्य आॢथक बोझ से जूझना पड़ता है। स्टेशनरी के लिए अलग से रुपये लिए जाते हैं। इसमें कॉपी-किताब, पेंसिल, बैग शामिल होता है। स्कूल वाहनों में फिटनेस की अनदेखी बच्चों को विद्यालय लाने-ले जाने के लिए प्रतिमाह वाहनों के फिटनेस की अनदेखी की जाती है। अनेक प्राइवेट स्कूलों के बच्चों को लाने-लेजाने के लिए वाहन व रिक्शों पर क्षमता से अधिक बच्चों को बिठाया जाता है। अधिकांश प्राइवेट स्कूलों में आग लगने की आशंका के मद्देनजर कहीं भी अग्निशमन यंत्र नहीं दिखाई देते हैं। शिक्षा का अधिकार कानून लागू के बाद भी इसके तहत प्राइवेट स्कूलों में गरीब बच्चों के लिए फ्री एडमिशन को कोटा निर्धारित किया गया है। लेकिन यहां के अधिकांश प्राइवेट स्कूलों में शिक्षा का अधिकार कानून के अनुरूप स्टैंडर्ड वन में 25 प्रतिशत बच्चों का नि:शुल्क एडमिशन की सुविधा प्रदान नहीं किए जाने की शिकायत सुनी जाती रही है।
– यथार्थ योद्धा पड़ताल
– स्कूल में ना खेल मैदान और ना ही गाडिय़ों की पार्किंग की व्यवस्था
ये तस्वीर देखकर आपको लग रहा होगा कि किसी गली कूचे का फोटो है, लेकिन आपको यह जानकर आश्चर्य होगा कि इसी जगह से अग्रसेन स्कूल गंज का प्रवेश द्वार है और सबसे बड़ी बात यह है कि इसी गली से सैकड़ों बच्चे रोजाना स्कूल में प्रवेश करते हैं और बाहर निकलते हैं, जब अभिभावक बच्चों को लेने आते हैं तो इस पूरे क्षेत्र में पैर रखने तक की जगह नहीं रहती, कुल मिलाकर रोजाना स्कूल के बाहर आधे घंटे के लिए ट्रैफिक जाम जैसी स्थिति निर्मित हो जाती है।
गौरतलब है कि शिक्षा विभाग द्वारा निजी स्कूलों को दी जाने वाली मान्यताओं में जो शर्तें और नियम हैं उनके एक एकड़ से ज्यादा जगह स्कूल के लिए तय की गई है, वहीं स्कूल में खेल मैदान होना अनिवार्य है तो वहीं गाड़ी पार्किंग की व्यवस्था भी जरूरी है। शिक्षा विभाग के किसी भी आला अधिकारी ने अब तक यह जहमत नहीं उठाई कि एक बार अग्रसेन स्कूल का भी चक्कर लगा आएं, क्योंकि अधिकारियों को भी पता है कि यदि स्कूल से मान्यता संबंधी सभी शर्तों पर बात की जाए तो स्कूल में ताला डल जाएगा।
खैर जो भी लेकिन अग्रसेन स्कूल मैनेजमेंट को पालकों और बच्चों की परेशानियों को देखते हुए प्रवेश द्वार के आस-पास पर्याप्त जगह रखने की व्यवस्था करनी चाहिए या प्रवेश द्वार ही दूसरी ओर से बनवा लेना चाहिए, क्योंकि जिस जगह पर अभी स्कूल का प्रवेश द्वार है वह गली बाजार क्षेत्र में है और बहुत सकरी है जहां से एक साथ 10 बच्चे निकल ही नहीं सकते। जगह नहीं होने की वजह से स्कूल में आए दिन होने वाले कार्यक्रमों में भी परेशानियों का सामना करना पड़ता है या तो फिर कार्यक्रम ही रद्द करना पड़ जाता है।



