बैतूल

Betul BJP News: जब बैतूल आदिवासी बाहुल्य जिला है तो फिर, आदिवासी भाजपा जिलाध्यक्ष क्यों नहीं?

Betul BJP News: When Betul is a tribal dominated district, then why is there no tribal BJP district president?

Betul BJP News: नए भाजपा जिलाध्यक्ष के लिए उठापटक का दौर शुरू हो गया है। बबला शुक्ला का कार्यकाल समाप्त हो रहा है, इससे अब भाजपा में जिलाध्यक्ष को लेकर सुगबुगाहट शुरू हो गई है, कई दावेदार भी अपनी ताकत दिखा रहे हैं, तो कई बबला को ही दोबारा जिलाध्यक्ष देखना चाहते हैं, लेकिन ऐसा संभव नहीं क्यों कि भाजपा में जिलाध्यक्ष रिपीट करने की पंरपरा नई गाइड लाइन के तहत खत्म हो गई है। 

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खैर जो भी लेकिन भाजपा और कांग्रेस ने आदिवासी बाहुल्य जिले के आदिवासियों से हमेशा ही छल किया है। बैतूल भाजपा को अपने आलाकमान से सबक लेना चाहिए कि उन्होंने आदिवासी वर्ग से आने वाली माननीया द्रोपदी मुर्मु को महामहीम राष्ट्रपति का पद दिया। वहीं केंद्रीय नेतृत्व ने बैतूल के ही आदिवासी वर्ग से आने वाले दुर्गादास उईके को सांसद के साथ-साथ केंद्रीय मंत्री भी बनाया।

Betul BJP News: तो बैतूल में आदिवासी जिलाध्यक्ष क्यों नहीं हो सकता

दलगत रानजीति किसे कहते हैं ये भाजपा और कांग्रेस दोनों ने साबित कर दिया है। दोनों ही दलों के यदि पूर्व जिलाध्यक्ष देखेे जाएं तो पार्टी ने ज्यादातर बामन-बनियाओं को ही इस कुर्सी पर आसीन किया है।

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आदिवासी वाटरों को साधने के लिए आरक्षित सीट पर जरूर सांसद आदिवासी वर्ग से रहा है, लेकिन यदि ये सीट भी जनरल होती तो इस पर भी कोई बामन-बनिया ही राज करता। कुल मिलाकर आदिवासियों को दोनों ही दल कमतर आंकते हैं या तो उनकी प्रतिभा पर प्रश्नचिन्ह लगाते हैं कि किसी भी दल का प्रतिनिधित्व करने की क्षमता आदिवासियों में नहीं है, यदि भाजपा और कांग्र्रेस दोनों ही ऐसा सोचते हैं तो ये उनकी ओछी सोच का सटीक उदाहरण है।

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या तो भैया जो बोलेंगे वही होगा वाला मामला भी भाजपा के सामने होगा। आजादी की लड़ाई में बैतूल के आदिवसियों ने अंगे्रजों को नाको चने चबवाएं हैं ये भाजपा और कांग्रेस भी जानती है, लेकिन भाजपा जिलाध्यक्ष पद पर किसी आदिवासी को ना बैठाना एक तरह से घटिया सोच को उजागर करता है।

Betul BJP News: ये रहे हैं अब तक भाजपा के जिलाध्यक्ष पद पर आसानी

बैतूल भाजपा जिलाध्यक्ष पद की कमान अब तक भगवत सिंह पटेल, विजय कुमार खंडेलवाल, मोतीलाल पटेल जवाुड़ी, रामचरित मिश्रा, राजा ठाकुर, शिवप्रसाद राठौर, अलकेश आर्य, जितेंद्र वर्मा, हेमंत खंडेलवाल अनिल सिंह कुशवाहा, जितेन्द्र कपूर, बाबा माकोड़े, बबला शुक्ला अब नए अध्यक्ष की तलाश जारी है। वहीं कांग्रेस में घनश्याम तिवारी, शांति लाल ताटेड, सिद्दीक पटेल 2012 से 2013 तक, समीर खान 2013 से 2018 तक, सुनील गुड्डू शर्मा 2018 से 2023 तक, हेमंत वागादरे 2023 से 2024 तक रहे हैं। इनमें से कोई भी आदिवासी नहीं है, जबकि पूरा जिला आदिवासी बाहुल्य है फिर आदिवासी युवाओं को मौका क्यों नहीं दिया जा रहा।

Betul BJP News: क्या? भाजपा-कांग्रेस ने किया आदिवासियों से छल….?

अब बड़े नेता लें जिम्मेदारी नहीं थोपेंगे अपनी पसंद का नेताये दोगलापन है या दगाबाजी या फिर राजनीति की बाजीगरी

ये दोगलापन है या दगाबाजी या फिर राजनीति की बाजीगरी साम, दाम, दंड, भेद ये चार पहलू राजनीति में अपनाए जाते हैं, लेकिन जिले के भोल भाले आदिवासी ये सब नहीं जानते हैं, यही कारण है कि स्थानीय राजनेता चाहे वह भाजपा का हो या कांग्रेस का हमेशा ही आदिवासियों से दोगलापन करता आया है, या इसे दगाबाजी भी कहते हैं क्योंकि राजनीति के बाजीगर अच्छे से जानते हैं जिले के आदिवासी आगे बढ़ गए उनका तख्तोताज खतरे में पड़ जाएगा।

सांसद का पद आरक्षित इसलिए इस पर आदिवासी सांसद काबिज है, यदि जनरल होता तो यकीन मानिए राजनीतिक के बाजीगरों में से ही कोई बामन-बनिया ही इस कुर्सी को सुशोभित करता, ऐसा नहीं है कि इस पद के जनरल होने का इंतजार नहीं किया जा रहा है भरसक प्रयास भी किए जा रहे हैं कि ये सीट में जनरल हो जाए, लेकिन भला हो आलाकमान का की थोड़ी ही सही कुछ तो राहत आदिवासियों को दी गई है। 

वहीं कई ऐसे आदिवासी नेता हुए हैं जो अब गुमनामी के अंधेरे में गुम गए हैं, ये कमाल केवल बैतूल की बाजीगरी वाली राजनीति का ही है। लेकिन कब तक… यदि बाबा साहब अंबेडकर पांचवी अनुसूचि में अनुसूचित जाति और जनजाति को आरक्षण, उनका हक और अधिकार नहीं देते तो ना जाने एससी, एसटी के लोग भी गुमनानी में अंधेरे में खो जाते…।

Betul BJP News: तो क्या आदिवासियों का हक मारा जा रहा है?

बैतूल जिले के आदिवासियों की प्रतिभा का डंका तो देश-विदेश तक बज रहा है, लेकिन स्थानीय राजनीतिक दल ही बेचारे आदिवासियों को मौका नहीं दे रहे हैं। ये भी हो सकता है कि भाजपा और कांग्रेस के दिग्गज नेता आदिवासी युवाओं कार्यक्षमता, कुशलता पर संदेह करते हों, हो सकता है कि उन्हें ऐसा लगता है कि कोई आदिवासी युवा इस पद के लायक नहीं है। लेकिन भाजपा और कांग्रेस में दिग्गज आदिवासी नेता भी रहे हैं, स्व. सज्जनसिंह उईके विधायक रहे हैं। वहीं धरमूसिंह सिरसाम कांग्रेस से विधायक रहे हैं, मंगल सिंह धुर्वे, महेंद्र सिंह चौहान जैसे दिग्गज नाम शामिल हैं। 

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Betul BJP News: अन्य क्षेत्रों में चाहे वह एजुकेशन हो , राजनीति हो, खेती किसानी हो या कला क्षेत्र हो सभी तरफ आदिवासियों की प्रतिभा इस समय दिखाई दे रही है। वहीं राजनीतिक संगठन की बात करें तो जितनी भीड़ जयस संगठन के पास है उतनी तो कांग्रेस भी अब इकट्ठा नहीं कर पाती है, बावजूद इसके भाजपा जिलाध्यक्ष के लिए किसी आदिवासी युवा को मौका नहीं देता सीधे सीधे दोनों दलों का दोगला पन है। इधर एक तरह से देखा जाए आदिवासियों में से किसी ऐसे युवा को मौका देना चाहिए जो जिले की आदिवासी जनता के हित में काम करे। 

जैसा भी लेकिन देखने और समझने में यही लगता है दोनों दलों सहित छोटे दलों ने भी आदिवासियों की उपेक्षा ही की है नहीं तो ऐसा नहीं कि अध्यक्ष पद किसी आरक्षण का मोहताज है, अब देखना यह है कि आगे आगे होता क्या है।

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Betul BJP News: बाबा साहब संविधान में स्थान नहीं देते तो क्या होता…

पांचवीं अनुसूची के प्रभावी कार्यान्वयन के लिए क्या कदम उठाए जा सकते हैं?

Betul BJP News: भारत में अनुसूचित जनजातियों (एसटी) के सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक विकास के लिए भारतीय संविधान की पांचवीं अनुसूची का प्रभावी कार्यान्वयन महत्वपूर्ण है। पांचवीं अनुसूची के प्रभावी कार्यान्वयन के लिए निम्चनलिखित कदम उठाए जा सकते हैं:-

  • > संस्थागत तंत्र को मजबूत करना: पांचवीं अनुसूची के कार्यान्वयन के लिए जिम्मेदार संस्थागत तंत्र, जैसे जनजाति सलाहकार परिषदों को मजबूत करने की आवश्यकता है। 
  • > समावेशी विकास: अनुसूचित क्षेत्रों में विकास प्रक्रिया समावेशी होनी चाहिए और इसमें जनजातीय समुदायों की विशिष्ट आवश्यकताओं और चिंताओं का समाधान होना चाहिए । जनसंख्या के कमजोर वर्गों के लिए सामाजिक सुरक्षा और कल्याणकारी उपायों का प्रावधान होना चाहिए।
  • > संसाधनों का आवंटन: सरकार को अनुसूचित क्षेत्रों में बुनियादी ढांचे, शिक्षा, स्वास्थ्य और अन्य बुनियादी सुविधाओं के विकास के लिए स्थानीय निकायों को पर्याप्त संसाधन आवंटित करना चाहिए। 
  • > अनुसूचित जनजाति समुदायों की क्षमता निर्माण: उन्हें निर्णय लेने की प्रक्रिया में प्रभावी रूप से भाग लेने में सक्षम बनाने के लिए, अनुसूचित जनजाति समुदाय के सदस्यों के लिए प्रशिक्षण और शिक्षा के प्रावधानों को शीघ्रातिशीघ्र क्रियान्वित किया जाना चाहिए। 
  • शक्तियों का हस्तांतरण: सरकार को स्थानीय जनजातीय परिषदों को शक्तियां हस्तांतरित करके तथा उन्हें अपने समुदायों को प्रभावित करने वाले मामलों पर निर्णय लेने हेतु सशक्त बनाकर जनजातीय स्वशासन को बढ़ावा देने की आवश्यकता है।
  • > दृष्टिकोण में परिवर्तन: केंद्र और राज्य सरकारों को अनुसूचित क्षेत्रों के कल्याण के प्रति अपने दृष्टिकोण और धारणा में परिवर्तन करने की आवश्यकता है।
  • > अनुसूचित क्षेत्रों में आदिवासी आबादी की सुरक्षा के लिए राज्यपाल के पास विशेष अधिकार और ज़िम्मेदारियां होती हैं. 
  • > किसी क्षेत्र को अनुसूचित क्षेत्र घोषित करने के लिए ढेबर आयोग ने कुछ मानदंड तय किए थे. इनमें से एक मानदंड था कि क्षेत्र में जनजातीय आबादी 50 प्रतिशत से कम नहीं होनी चाहिए. 
  • > राष्ट्रपति के निर्देश पर, अनुसूचित जनजातियों वाले किसी भी राज्य में टीएसी बनाई जा सकती है. इस टीएसी में 20 से ज़्यादा सदस्य नहीं हो सकते और इनमें से तीन-चौथाई सदस्य राज्य की विधानसभा में अनुसूचित जनजातियों के प्रतिनिधि होते हैं. 
  • > अनुसूचित क्षेत्रों और अनुसूचित जनजातियों के प्रशासन और नियंत्रण के लिए पांचवीं अनुसूची के प्रावधान, छठी अनुसूची के तहत आने वाले राज्यों को छोडक़र बाकी सभी राज्यों में लागू होते हैं. 
  • > संविधान के अनुच्छेद 46 के मुताबिक, राज्य को समाज के कमज़ोर वर्गों, खासकर अनुसूचित जातियों और अनुसूचित जनजातियों के शैक्षणिक और आर्थिक हितों का विशेष ध्यान रखना चाहिए.

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Sagar Karkare

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