MP Politics 2025: नेतृत्व से दूर आदिवासी समाज, कब टूटेगा सियासी सन्नाटा?
MP Politics 2025: Tribal society away from leadership, when will the political silence break?
MP Politics 2025: मध्य प्रदेश मे इस वक़्त भाजपा का प्रदेश अध्यक्ष का चुनाव होने जा रहा है लेकिन अभी तक घोषणा नहीं हो पाई है। प्रदेश मे एक विशेष वर्ग को संघठन कि जिम्मेदारी देने की चर्चा जोरों पर है। लेकिन आदिवासी वर्ग के व्यक्ति को नेतृत्व देने की बात कही सुनाई नहीं दी। जब बात नेतृत्व की आती है, तो दोनों ही दलों की नीयत पर सवाल खड़े होते हैं?
प्रदेश में आदिवासी जनसंख्या का बड़ा हिस्सा होने के बावजूद आज तक न भाजपा ने और ना ही कांग्रेस ने आदिवासी समाज से कोई प्रदेश अध्यक्ष नियुक्त किया है। आदिवासी समाज को मुख्य धारा से जोड़ने के लिए दोनों ही पार्टी मंचों से भाषण में ही याद रखती है।

MP Politics 2025: भाजपा के 11 अध्यक्ष, एक भी आदिवासी नहीं
भाजपा ने अब तक मध्य प्रदेश में 11 प्रदेश अध्यक्ष बनाए हैं, लेकिन एक भी नाम आदिवासी वर्ग से नहीं रहा। यह आंकड़ा साफ दिखाता है कि पार्टी के भीतर आदिवासी समाज को नेतृत्व का मौका नहीं दिया गया है।
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MP Politics 2025: कांग्रेस का आदिवासी प्रेम सिर्फ भाषणों तक
वहीं कांग्रेस, जो खुद को दलित, पिछड़ा और आदिवासी हितैषी पार्टी कहती है, उसने भी अब तक प्रदेश अध्यक्ष के पद पर किसी आदिवासी नेता को नहीं बिठाया। चुनावी समय में ‘आदिवासी हित’ की बातें करने वाली कांग्रेस भी इस मुद्दे पर फेल साबित हुई है।

MP Politics 2025: वोट बैंक के नाम पर सिर्फ इस्तेमाल?
ये आंकड़े एक बड़ा सवाल खड़ा करते हैं—क्या आदिवासी समाज सिर्फ वोट बैंक बनकर रह गया है? क्या सत्ता और विपक्ष दोनों ही पार्टियां केवल चुनावी वक्त में ‘वनवासी भाई-बहनों’ की बात करती हैं, लेकिन असली नेतृत्व देने में कतराती हैं?
MP Politics 2025: आदिवासी समुदाय की सशक्त उपस्थिति, लेकिन प्रतिनिधित्व गायब
गोंड, भील, कोरकू जैसे समुदायों की संख्या लाखों में है। ये समाज हर चुनाव में निर्णायक भूमिका निभाते हैं। इसके बावजूद इनकी भागीदारी सिर्फ मोर्चों, रैलियों या सांस्कृतिक आयोजनों तक सीमित क्यों रखी जाती है?

MP Politics 2025: अब भी नहीं जागे तो कब?
अब समय आ गया है कि आदिवासी समाज इस राजनीतिक उपेक्षा के खिलाफ संगठित होकर आवाज उठाए। सिर्फ मंच और माइक नहीं, प्रदेश अध्यक्ष जैसी जिम्मेदारी भी आदिवासी वर्ग को मिले—तभी लोकतंत्र की असली परिभाषा पूरी होगी।
नेतृत्व का अधिकार सभी को मिले—ये सिर्फ नारा नहीं, ज़रूरत है।
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